आपको लगता है कि आप दूसरों से बेहतर हैं?
या आपको लगता है कि दूसरे आपसे बेहतर हैं?
दोनों ही स्थितियों में आप अभी भी दूसरों के अधीन हैं।
क्यों?
क्योंकि आपने अपने मूल्य का पैमाना अपने हाथ में रखा ही नहीं।
आपने किसी दूसरे को अपना पैमाना बना लिया।
जब आप कहते हैं—
“मैं उससे बेहतर हूँ।”
तो आप श्रेष्ठता में हैं।
और जब कहते हैं—
“वह मुझसे बेहतर है।”
तो आप हीनता में हैं।
ऊपर हों या नीचे—
तुलना के खेल में आप दोनों ही बार बंधे हुए हैं।
तो तुलना छोड़ें कैसे?
सिर्फ यह तय कर लेना कि “अब मैं तुलना नहीं करूँगा” पर्याप्त नहीं है।
तुलना मन की आदत है।
इसे देखने की आदत डालनी होगी।
पहला कदम — तुलना पकड़िए।
जब भी मन कहे—
“उसके पास मुझसे ज्यादा है…”
“मैं उससे अच्छा हूँ…”
“वह मुझसे आगे निकल गया…”
बस रुकिए।
तुरंत उस विचार को सही या गलत साबित करने की कोशिश मत कीजिए।
केवल देखिए—
“मैं अभी तुलना कर रहा हूँ।”
इतना देख लेना ही पहला कदम है।
दूसरा कदम — प्रश्न बदलिए।
“उसके पास क्या है जो मेरे पास नहीं?”
की जगह पूछिए—
“मुझे वास्तव में क्या चाहिए?”
“मैं उससे बेहतर हूँ या नहीं?”
की जगह पूछिए—
“मैं कल से आज कितना बेहतर हूँ?”
दूसरों से तुलना आपको बाहर ले जाती है।
अपने कल से तुलना आपको भीतर वापस लाती है।
तीसरा कदम — दूसरे की सफलता को अपनी असफलता मत बनाइए।
किसी का आगे बढ़ना इस बात का प्रमाण नहीं है कि आप पीछे हैं।
किसी की सुंदरता आपकी सुंदरता कम नहीं करती।
किसी की संपत्ति आपकी कीमत तय नहीं करती।
किसी की उपलब्धि आपकी असफलता नहीं है।
दूसरे का जीवन, आपके जीवन की परीक्षा नहीं है।
चौथा कदम — अपनी दिशा तय कीजिए।
हर दिन केवल एक प्रश्न पूछिए—
“आज मैं अपने जीवन में क्या थोड़ा बेहतर कर सकता हूँ?”
एक छोटा सुधार।
एक सही निर्णय।
एक अधूरा काम पूरा करना।
एक गलत आदत को थोड़ा कम करना।
यही आपकी वास्तविक प्रतिस्पर्धा है—
आप स्वयं से।
और अंत में—
तुलना को समाप्त करने की कोशिश मत कीजिए।
बस हर बार जब तुलना दिखाई दे, उसे पहचान लीजिए।
जिस चीज़ को आप स्पष्ट रूप से देख लेते हैं, उससे धीरे-धीरे आपकी पहचान अलग होने लगती है।
फिर एक दिन आप पाएँगे—
न किसी से ऊपर होने की बेचैनी है,
न किसी से नीचे होने का दुख।
बस अपने होने की सहजता है।
शायद यही स्वतंत्रता है।
और शायद यहीं से स्वयं को जानना शुरू होता है।
खरी बात यह है कि जब तक हम स्वयं को दूसरों से तौलते रहेंगे, तब तक हम स्वयं को जान ही नहीं पाएँगे।
— अमीतो बाबा
